Pehli Mulaqat
खुशी थी, हल्की उदासी थी,
शायद ऐसी ही हमारी कहानी थी.
मिलना भी था, बिछड़ना भी था,
ना जाने खुदा की क्या मजबूरी थी.
कितने सालों के बाद, तुमसे मिलने की,
हिम्मत ना जाने क्यूं आई थी,
किस्मत को मेरे पे तरस कैसे आई थी.
सोचा तो था, तुझसे इज़हार करूंगा,
थोड़ा मैं भी आशिकों का मान करूंगा.
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बचपन का प्यार थी तो, तुझे बताना था,
तुझे थोड़े ही मुझे रुलाना था.
बिन सोचे, मैंने सब बोल डाला,
तू भी मुस्कराने लगी, मेरी नादानी,
पर अखरने लगी, सोचो तूने ना होगा,
आशीक़ तेरा एक ऐसा होगा.
दिल जब हल्का कर डाला,
आंखों मैं आंसू लिए, तुझे अलविदा कह डाला.
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